July 3, 2022

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मूवी रिव्‍यू: द कश्‍मीर फाइल्‍स

इतिहास के पन्‍नों में ऐसी कई दर्दनाक घटनाएं दर्ज हैं, जिसने इंसानियत और समाज दोनों को न सिर्फ शर्मसार किया, बल्‍क‍ि ऐसा जख्‍म दिया जिसके निशान आज भी मिलते हैं। कश्‍मीर से अल्‍पसंख्‍यक हिंदू पंडितों का पलायन, उनकी दुर्दशा ऐसी ही एक सच्ची त्रासदी है। ‘द कश्‍मीर फाइल्‍स’ (The Kashmir Files Review) एक ऐसी फिल्‍म है, जो आपको भावनात्मक रूप से जगाती है। यह 1990 के दशक की कश्मीर घाटी को दिखाती है। कश्‍मीरी पंडितों पर आतंकियों के जुल्‍म को दिखाती है। इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर किए जाने की कहानी कहती है।
जिस मिट्टी पर आपने जन्‍म लिया। जिस आंगन में आपका बचपन ख‍िला। जिन गलियों में आपने अपनी जवानी काटी। उस मिट्टी, उस आंगन और उन गलियों को हमेशा के लिए छोड़ना पड़े, अपने ही देश में रिफ्यूजी की तरह जिंदगी बसर करनी पड़े। इस दर्द का जिक्र करना जितना आसान है, उसे सहन करना उतना ही मुश्‍क‍िल। ‘द कश्‍मीर फाइल्‍स’ उस त्रासदी का दंश झेल चुके ऐसे ही लोगों की सच्‍ची कहानियों पर आधारित है। वो जिन्‍हें शरणार्थी कहा गया। फिल्‍म एक तर्क देती है कि यह सिर्फ एक पलायन नहीं था, बल्कि एक बर्बर नरसंहार था, जिसे राजनीतिक कारणों से दबा दिया गया। ये लोग लगभग 30 साल से निर्वासन में रह रहे हैं, उनके घरों और दुकानों पर अब इतने वक्‍त में स्थानीय लोगों ने कब्‍जा कर लिया है। कश्मीरी पंडित आज भी न्याय की उम्मीद करते हैं और सबसे जरूरी बात यह कि उन्हें उनका सम्‍मान, उनकी पहचान मिलनी चाहिए। यह दिलचस्‍प है कि सिनेमाई पर्दे पर अभी तक इन विस्थापित परिवारों के दर्द को कुछ एक बार ही उकेरा गया है।

आप चाहे किसी भी विचारधारा से हों, आस्था हो या पीड़ा, किसी की आवाज को दबाना एक बुरे सपने की तरह है। कश्मीर, वो स्वर्ग है, जो कहीं खो गयाहै। आतंकवाद, सीमा पर तनाव, मानवीय संकट, अलगाववादी आंदोलन और एक लड़ाई खुद के लिए। आज कश्‍मीर इसी में व्‍यस्‍त है। वो कश्‍मीर, जो कभी समृद्ध था, जहां एकसाथ कई संस्कृतियां थीं। लेकिन अब यह विवादित क्षेत्र लगातार घटते-बढ़ते तनाव के बीच खुद को स्थिर करने के लिए जद्दोजहद में डूबा हुआ है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ वह जख्‍म से बैंड-ऐड हटाने जैसा है, जो काफी गहरा है। तीन घंटे से भी कम समय में इस फिल्‍म के बहाने सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। लेकिन पुरानी कहावत है कि हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं।

विवेक अग्निहोत्री की यह फिल्‍म पलायन की त्रासदी की समीक्षा करती है। यह उस दौर के रिपोर्टों पर आधारित है। कश्‍मीरी पंडितों द्वारा कही जा रही खुद की कहनी पर आधारित है। धर्म के कारण उनके साथ जो क्रूरता हुई, फिल्‍म इस पर भी बात करती है। फिर चाहे वह टेलीकॉम इंजीनियर बीके गंजू की चावल के बैरल में हत्या हो या नदीमार्ग हत्याकांड, जहां 24 कश्मीरी पंडितों को सेना की वर्दी पहने आतंकवादियों ने मार दिया था। फिल्म इन सच्‍ची घटनाओं एक उम्रदराज राष्ट्रवादी, पुष्कर नाथ पंडित (अनुपम खेर), उनके चार सबसे अच्छे दोस्त और उनके पोते कृष्णा (दर्शन कुमार) की आंखों से देखते हैं। यह अपने अतीत से बेखबर कृष्णा के लिए भी सच की खोज की कहानी बनती है।

पुराने जख्‍मों से पट्टी हटाना, समाधान नहीं है। लेकिन ईलाज भी तभी संभव है, जब चोट को स्वीकार कर लिया जाए। विवेक अग्निहोत्री ने फिल्‍म में बर्बर घटनाओं को दिखाने में कहीं भी संकोच नहीं किया है। न ही उसपर कोई फिल्‍टर डाला है, ताकि उसके प्रभाव को कम किया जाए। ऐसे में हम पर्दे पर जो भी देखते हैं, वह बहुत ही गंभीर है और गहन भी। कहानी थोड़ी उलझी हुई जरूर है, क्‍योंकि इसमें सीधी सपाट बात न होकर, उसने कहा-इसने कहा वाली बात ज्‍यादा है। ऐसे में आप फिल्‍म के कैरेक्‍टर से जुड़ नहीं पाते हैं। फिल्म में कई मुद्दों को समेटने की कोश‍िश की गई है, इसमें जेएनयू की बात है, मीडिया की तुलना आतंकवादियों की रखैल से की गई है, विदेशी मीडिया पर सिलेक्‍ट‍िव रिपोर्टिंग का आरोप लगाया गया है, भारतीय सेना, राजनीतिक युद्ध, अनुच्छेद 370 और पौराणिक कथाओं से लेकर कश्मीर के प्राचीन इतिहास तक, फिल्‍म में सबकुछ एकसाथ दिखाया गया है।

यह जरूर है कि पुष्कर नाथ पंडित और उनकी कहानी आपकी आंखें नम करती हैं। लेकिन फिर यह फिल्‍म कहीं न कहीं खो जाती है। यह ज्‍यादा लंबी लगने लगती है, जिसमें डिटेलिंग की कमी है। ऐसा लगने लगता है कि अराजकता अध‍िक हो गई है और संदर्भ कम। इसी बीच आपके अंदर एक असहमति का भाव भी जगता है। किरदार एकतरफा कहानी लेकर बढ़ते हैं, जिस कारण संतुलन बिगड़ जाता है। फिर ऐसा लगने लगता है कि यह सब बस एक औपचारिकता है।

अनुपम खेर ने एक बार फिर जबरदस्‍त ऐक्‍ट‍िंग की है। वह अपने परफॉर्मेंस से दिल दहला देते हैं। पर्दे पर उन्‍हें देखकर, उनके दर्द को समझते हुए आपका गला भी बैठ जाता है। वह अपने खोए हुए घर के लिए तरस रहे एक इंसान के रूप में बेहतरीन हैं। पल्लवी जोशी भी उतनी ही प्रभावशाली रही हैं। बतौर दर्शक, आपको यह कमी खलती है कि पल्‍लवी जोशी के किरदार में कुछ और भी होना चाहिए था। चिन्मय मंडलेकर और मिथुन चक्रवर्ती ने अपने-अपने रोल के साथ न्‍याय किया है।
कश्‍मीरी पंडितों के पलायन और उस त्रासदी पर इससे पहले विधु विनोद चोपड़ा रोमांटिक ड्रामा ‘शिकारा’ लेकर आए थे। तब उनकी खूब आलोचना हुई थी कि उन्‍होंने फिल्‍म में कश्‍मीरी पंडितों के दर्द पर ज्‍यादा फोकस नहीं किया। हालांकि, वह फिल्‍म आपको उनकी संस्कृति, दर्द और निराशा की स्थिति के बेहद करीब लेकर जाती है। लेकिन विवेक अग्निहोत्री ऐसा नहीं करते। वह उस दर्द को भी बेधड़क दिखाते हैं और उसमें राजनीति और उग्रवाद को सबसे आगे रखते हैं। अपने घर से बेघर होने दर्द फिल्‍म के बैकग्राउंड में घुमड़ता रहता है।