July 1, 2022

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‘रेत की समाधि’ उपन्यास की लेखक गीतांजलि श्री को मिला इंटरनेशनल बुकर प्राइज

इंटरनेशनल बुकर प्राइज (International Booker Prize) जीतकर देश को सम्मान दिलाने वाली गीतांजलि श्री (Geetanjali Shree) के नाम से कोई अब अनजान नहीं है. उन्होंने देश को पहली बार ये प्राइज दिलाया है. उनके उन्यास रेत की समाधि (Ret Ki Samadhi) जिसे अंग्रेजी में अनुवाद करके टॉम्ब ऑफ सैंड (Tomb Of Sand) नाम दिया गया उसने इंटरनेशनल बुकर प्राइज (International Booker Prize) का सम्मान प्राप्त किया है. सम्मान मिलने के बाद गीतांजलि ने कहा कि उन्होंने कभी बुकर प्राइज (Booker Prize) जीतने का सपना नहीं देखा था. उन्होंने कभी भी इसके बारे में सोचा भी नहीं था लेकिन ये सम्मान उनको मिला जिसकी खुशी वो बयां नहीं कर सकतीं, बहुत ही सम्मानित महसूस कर रही हैं. उनके हिंदी उपन्यास रेत की समाधि का अंग्रेजी में अनुवाद मशहूर लेखिका डेजी रॉकवेल (Daisy Rockwell) ने किया है. उन्होंने इसे अंग्रेजी में टॉम्ब ऑफ सैंड के नाम से अनुवाद किया है. इसके लिए दोनों ही लोगों को सम्मानित किया गया है.

हालांकि ये एक दुख की ही बात है कि लगातार और महत्त्वपूर्ण लेखन के बाद भी गीतांजलि श्री को हिंदी साहित्य के संसार ने तब अचानक से जाना जब बुकर पुरस्कार के लॉन्ग लिस्ट में रेत समाधि को शामिल किया गया. इस लिस्ट के सामने आने के बाद हिंदी साहित्य संसार के बीच गुमनाम सी रहीं गीतांजलि श्री अचानक चर्चा में आ गईं. फिलहाल, गीतांजलि श्री की रेत समाधि को मिले बुकर सम्मान ने हिंदी का कद ऊंचा किया है.कौन हैं गीतांजलि श्री?

बुकर प्राइज जीतने से पहले गीतांजलि श्री को कितने लोग जानते थे. सवाल तो बनता ही है. हिंदी साहित्य में गीतांजलि श्री बहुत पुराना नाम है. गीतांजलि मूल रुप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं. उनका जन्म मैनपुरी जिले में साल 1957 में हुआ था. फिलहाल वो दिल्ली में रहती हैं. उनको गीतांजलि पांडेय नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने अपनी मां के पहले नाम श्री को अपने नाम से जोड़ लिया और वो गीतांजलि श्री के नाम से हिंदी साहित्य में फेमस हो गईं. गीतांजलि ने कई शार्ट स्टोरीज के अलावा 5 नॉवेल भी लिखे हैं. उनका पांचवा नॉवेल रेत समाधि है जिसे इंटरनेशनल बुकर प्राइज मिला है. इस उपन्यास का अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच भाषा में भी अनुवाद किया है. उन्होंने अपना पहला उपन्यास माई के नाम से लिखकर साहित्य की दुनिया में कदम रखा था. गीतांजलि के उपन्यासों का अंग्रेजी और फ्रेंच के अलावा जर्मन, सर्बियन और कोरियाई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.