December 5, 2022

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दुनिया में लगभग 79 करोड़ लोगों के पास नहीं है पीने का साफ पानी

हम सभी ये जानते हैं कि धरती पर 75 फीसद तक पानी है। इसके बाद भी दुनिया के कई देश लगातार पीने के पानी की किल्‍लत से दो-चार हैं। हमारी इस दुनिया में कई देश और कई शहर ऐसे हैं जहां पर लोगों को पीने के पानी या अपनी जरूरत के पानी के लिए मीलों का सफर तय करना पड़ता है। इसके बाद भी उन्‍हें साफ पानी नहीं मिलता है। ये हमारे विश्‍व की एक विडंबना रही है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की तरफ से इस समस्‍या के प्रति लगातार आगाह किया जाता रहा है। संयुक्‍त राष्‍ट्र के प्रयासों से पानी की समस्‍या को दूर करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन ये समस्‍या जस की तस बनी हुई है।
यूएन की एक रिपोर्ट बताती है कि विश्‍व में करीब 79 करोड़ लोगों को जरूरत के हिसाब से पानी मुहैया नहीं है। हर वर्ष गंदे पानी पीने की वजह से विश्‍व में लाखों लोग टाइफाइड की चपेट में आते हैं। वर्ष 2006 में आई संयुक्‍त राष्‍ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि हमारे पास लोगों की जरूरत को पूरा करने का पानी मौजूद है, लेकिन भ्रष्‍टाचार और अपनी कमियों की वजह से हम इसको मुहैया नहीं करवाते हैं। इस रिपोर्ट में ब्‍यूरोक्रेसी की नीयत पर भी सवाल उठाए गए थे। संयुक्‍त राष्‍ट्र के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक विश्‍व की जनसंख्‍या करीब 9-10 अरब के बीच होगी। ऐसे में लोगों की प्‍यास बुझाना या उन्‍हें जरूरत मुताबिक पानी मुहैया करवाना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
पानी की समस्‍या की एक बड़ी वजह क्‍लाइमेट चेंज भी रहा है। इसको लेकर लगातार विश्‍व को आगाह भी किया जाता रहा है। भारत समेत कई देश ने अपने यहां पर क्‍लाइमेट चेंज को लेकर बड़ा कदम भी उठाया है। बल्कि पिछले वर्ष विश्‍व मंच पर भारत के इन कदमों की काफी सराहना भी की गई थी। संयुक्‍त राष्‍ट्र की तरफ से यहां तक कहा गया था कि भारत अपने लक्ष्‍यों को पूरा करने के मामले में अन्‍य देशों से आगे है। संयुक्‍त राष्‍ट्र के मुताबिक पानी की खपत का एक बड़ा हिस्‍सा करीब 67 फीसद सिंचाई, 22 फीसद घरेलू कामकाज और करीब 11 फीसद उद्योगों में इस्‍तेमाल किया जाता है।
भारत समेत करीब दस देश विश्‍व के करीब 72 फीसद पानी का इस्‍तेमाल करते हैं। इनमें भारत के साथ चीन, अमेरिका, पाकिस्‍तान, ईरान, बांग्‍लादेश, मैक्सिको, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और इटली का नाम शामिल है। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि विश्‍व के विकासशील देशों की तुलना में विकसित देश करीब दस गुणा अधिक पानी का दोहन करते हैं।