August 18, 2022

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जब दो गुट एक ही पार्टी सिंबल पर दावा करते हैं तो कैसे होता है फैसला?

महाराष्ट्र में शिवसेना में बगावत के बाद अब पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुटों में खींचतान शुरू हो गई है। पार्टी के कुल 55 विधायकों में 40 विधायकों के साथ अलग होने वाले एकनाथ शिंदे गुट खुद को असली शिवसेना होने का दावा कर रहा है। शिंदे गुट का कहना है कि उसके साथ अधिक विधायकों का समर्थन है। ऐसे में पार्टी के आधिकारिक सिंबल तीर-धनुष पर उसका ही अधिकार है। वहीं, उद्धव ठाकरे की तरफ से चुनाव आयोग में एक कैवियट दाखिल कर कहा गया है कि आयोग उनका पक्ष सुने बिना पार्टी सिंबल को लेकर कोई भी फैसला ना करे। ये पहली बार नहीं है जब एक पार्टी में टूट या बगावत के बाद दो गुटों ने सिंबल पर अपना दावा किया है। आयोग के पास पहले भी इस तरह के कई मामले पहुंचे हैं। जानते हैं कि जब दो गुट एक ही सिंबल पर दावा करते हैं तो इस बारे में निर्वाचन आयोग कैसे फैसला करता है।

सवाल : सिंबल पर विवाद होने की स्थिति में चुनाव आयोग कैसे फैसला करता है?
जवाब : इस तरह के विवाद के निपटारे के लिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 का प्रावधान है। इसके तहत चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों को मान्यता देने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने का अधिकार है। आदेश के पैरा 15 के तहत, चुनाव आयोग प्रतिद्वंद्वी समूहों या किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के वर्गों के बीच विवादों को अपने नाम और प्रतीक पर दावा करने का फैसला कर सकता है। इसके लिए कुछ निर्धारित शर्तें हैं। शर्तें के पूरा होने को लेकर संतुष्ट होने के बाद ही आयोग सिंबल आवंटन करने का फैसला करता है।
सवाल : चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 की कानूनी वैधता क्या है?
जवाब : अनुच्छेद 15 के तहत, विवाद या विलय पर मुद्दों को तय करने के लिए चुनाव आयोग एकमात्र प्राधिकरण है। सुप्रीम कोर्ट ने 1971 में सादिक अली और एक अन्य बनाम चुनाव आयोग में इसकी वैधता को बरकरार रखा था।

सवाल : किसी एक धड़े को आधिकारिक पार्टी के रूप में मान्यता देने को लेकर चुनाव आयोग कैसे फैसला करता है?
जवाब : चुनाव आयोग मुख्य रूप से एक राजनीतिक दल के भीतर अपने पार्टी पदाधिकारियों की संख्या और उसके विधायक और सांसदों की संख्या के आधार पर दोनों धड़ों की स्थिति का पता लगाता है। पहले आयोग देखता है कि पार्टी के कितने पदाधिकारी किस गुट के साथ है। इसके बाद पार्टी के सांसदों और विधायकों की गिनती के आधार पर बहुमत देखा जाता है। इसके लिए सांसदों और विधायकों से आयोग हलफनामा भी लेता है, जिससे यह निर्धारित हो सके कि वह किस धड़े के साथ हैं। आयोग बिना दस्तावेज और दोनों पक्षों को सुने बिना कोई फैसला नहीं लेता है।

सवाल : एक धड़े को मान्यता मिलने के बाद दूसरे धड़े का क्या होता है?
जवाब : चुनाव आयोग दो गुटों में किसी भी एक गुट की दलीलों, दस्तावेजों और संख्या बल के आधार पर संतुष्ट होने के बाद एक गुट को मान्यता दे देता है। इस स्थिति में पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिह्न बहुमत वाले धड़े को मिल जाता है। ऐसे में आयोग दूसरे गुट को भी नई पार्टी के रूप में पंजीकरण कराने के बाद पार्टी सिंबल लेने के लिए कहता है।
सवाल : यदि दोनों गुटों अपना-अपना दावा साबित नहीं कर पाएं तो क्या होगा?
जवाब : दोनों गुटों की तरफ से अपना-अपना दावा साबित नहीं कर पाने या आयोग यह निर्णय नहीं ले पाए कि कौन से धड़े के पास बहुमत है तो इस स्थिति में चुनाव आयोग पार्टी का नाम और सिंबल को जब्त कर सकता है। इस सूरत में दोनों धड़ों को अलग-अलग दल के रूप में पंजीकरण कराने के बाद नया पार्टी सिंबल लेना होगा। आयोग की तरफ से पुरानी पार्टी के नाम के आगे या पीछे कोई नया शब्द लगाने का भी विकल्प होता है।

सवाल : यदि चुनाव करीब हों तो चुनाव आयोग तुरंत फैसला ले सकता है?
जवाब : चुनाव आयोग को इस तरह का फैसला करने में पर्याप्त समय की दरकार होती है। ऐसे में यदि चुनाव करीब हों तो आयोग पार्टी का नाम और सिंबल जब्त कर लेता है। इसके बाद दोनों धड़ों को नए पार्टी नाम और सिंबल पर चुनाव लड़ने को कहा जाता है।

सवाल : यदि भविष्य में दोनों धड़े आपस में समझौता कर लें तो क्या होगा?
जवाब : यदि दोनों धड़े भविष्य में एक हो जाते हैं तो वह चुनाव आयोग के पास जा सकते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग उन्हों एकीकृत पार्टी के रूप में मान्यता दे सकता है। चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह दोनों गुटों के मर्जर को मान्यता देते हुए एक पार्टी मान ले। इस स्थिति में आयोग पुराने पार्टी नाम और सिंबल को भी फिर से बहाल कर सकता है।

सवाल : इस तरह का सबसे पहला मामला कब सामने आया था और उसमें क्या फैसला हुआ था।
जवाब : इस तरह का मामला साल 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान तब आया था जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी। कांग्रेस सिंडिकेट की तरफ से नीलम संजीव रेड्डी आधिकारिक प्रत्याशी थे। उस चुनाव में वीवी गिरी निर्दलीय प्रत्याशी थे। माना जा रहा था कि इंदिरा गांधी का उनको समर्थन था। इंदिरा गांधी ने अंतरआत्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की थी। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष निंजलिगप्पा ने पार्टी प्रत्याशी को वोट देने के लिए व्हिप जारी किया। हालांकि, बड़े पैमाने पर कांग्रेस के नेताओं ने वीवी गिरी को वोट दिया। गिरी चुनाव जीत कर राष्ट्रपति बन गए। इसके बाद सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। हालांकि, बहुमत होने के कारण इंदिरा ने अपनी सरकार बचा ली थी। इसके बाद मामला चुनाव आयोग पहुंचा। उस समय आयोग ने कांग्रेस सिंडिकेट को ही असली कांग्रेस माना था। उस समय अधिकतर पदाधिकारी सिंडिकेट के साथ थे। ऐसे में पार्टी सिंबल दो बैलों को जोड़ा भी सिंडिकेट को ही मिला था। बाद में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (ई) पार्टी बनाई। आयोग की ओर से उन्हें बछड़ा पार्टी सिंबल मिला।

सवाल : शिवसेना के मामले में स्थिति क्या बन रही है?
जवाब : शिव सेना में बगावत के बावजूद अधिकर पार्टी पदाधिकारी उद्धव गुट के साथ हैं। इंदिरा गांधी के मामले को देखें तो पदाधिकारियों के संख्या में सांसदों और विधायकों को जोड़ लें तो उद्धव ठाकरे का पलड़ा भारी दिखाई देता है। एकनाथ शिंदे के साथ अभी तक एक भी पदाधिकारी नहीं है। हालांकि, 40 विधायकों के अलावा शिंदे गुट सांसदों में भी टूट का दावा कर रहा है। ठाणे के साथ ही मुंबई में कई पार्षद शिंदे धड़े के साथ हैं। ऐसे में आगे देखने होगा कि आयोग के सामने सुनवाई तक क्या स्थिति बनती है।